ये हैं 5 टाॅप नई कहानियां पढ़िए, new kahani in hindi

शेखर को बस एक ही समस्या थी. 
ऑफिस से घर आने पर जब रमा उसके लिए चाय बनाने किचन में जाती तो वह निढाल सोफे पर पसर जाता. रमा किचन से ही आवाज़ लगाती, "जल्दी चेंज कर लो, चाय तैयार होने ही वाली है". वह धीरे-धीरे अपनी टाई और कमीज़ खोलता और उसे सोफे के एक कोने पर फेंक देता. जूते उतारता और मोजे को उसी में ठूँस कर उठता. जूते को जूते के बने रैक में रखने के बाद अपनी हवाई चप्पलें ढूंढ़ता. एक मिनट के लिए भी वह खाली पैर नहीं रह सकता. फ़र्श पर नंगे पांव से उसे अजी ब बेचैनी होती. तलवे में फ़र्श की ठंढक लगती तो वह खीझ उठता. रमा तबतक चाय की ट्रे  ले आ चुकी होती. उसे परेशान देखती तो शर्मिंदा होते हुए कहती , "सॉरी, स्लीपर ढूँढ़ रहे हो? यह लो, गलती से मैंने पहन रखा है. चाय की ट्रे सेंटर टेबुल पर रख कर वह अपनी मैक्सी थोड़ा ऊपर उठाकर पांव दिखाते हुए चप्पलें उसके सामने खोल देती. शेखर को बहुत गुस्सा आता. रमा के छोटे से पांव में पांच नम्बर की चप्पलें अंटती जबकि उसे दस नम्बर की आतीं. खीझते हुए कहता,"क्या मजाक है यह? देखने मे ही जोकर लग रही थी. पांव से बाहर चप्पलें निकली हुईं जैसे छोटे बच्चे अपने पांव बाप के जूते में डाल देते हैं और पापा बनने की कोशिश करते हैं. तुम बच्ची नहीं रही, कम से कम मैच्योर बिहेव किया करो ".
रमा मजाक में अपने कान पकड़ कर सॉरी बोलती और कहती , " गुस्सा थूको, चलो चाय पी लो, ठंडी हो रही ही". शेखर चप्पलों में पैर डालता. रमा के पहने होने से उसे तलवे में गर्माहट मिलती. उसकी खीझ क्षण भर में कपूर की तरह उड़ जाती.
एक दो दिन ठीक चलता पर रमा आदतन फिर उसी की चप्पलें घर मे पहनती.


वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता. वह अपने रंग दिखाता है. रमा को एक दिन अचानक तकलीफ हुई और देखते-देखते उसने बिस्तर पकड़ लिया. अस्पताल में भर्ती होने के तीसरे ही दिन वह चल बसी. उसे एडवांस स्टेज का कैंसर था. 

अंत्येष्टि के बाद जब घाट से वह घर पहुँचे तो पांव धोने के बाद अपनी चप्पलें ढूंढ़ने लगे. 
पलंग के नीचे लगा कि चप्पलें पड़ी हुईं हैं . पांव अंदर घुसा कर उन्होंने चप्पलें निकाली और पहन ली. उनका आधा पांव चप्पल के बाहर था. फ़र्श की ठंढक से अब उन्हें कोई परेशानी नहीं थी.

2- 


एक गौरेया. मासूम. मेहनतकश. मां की ममता दिल में संजोए. बस एक ही मकसद. बच्चों के लिए दाना-पानी जुटाना. दाना के लिए मीलों जाना पडे तो भी नन्हे पंखों में ऐसी जान भरती कि दूरी अपना मायना खो बैठती.  ऐसे ही एक दिन अपनी चोंच में दाल का दाना लिए परदेस अपने घोंसले को जा रही थी जहां उसके बच्चे थे कि अनहोनी हो गयी. कहीं आराम करने के लिए रुकी कि दाल का दाना गिर गया और एक खूंटे में जा फंसा. लाख कोशिश के बावजूद दाना नहीं निकला. अब एक ही उपाय बचा कि किसी तरह खूंटा चीरा जाय तो दाल का दाना मिले. यह काम तो बढ़ई ही कर सकता है तो वह बढ़ई के पास जा पहुंची और लगी चिरौरी करने:
“बढ़ई बढ़ई तू खूंटा चीरअ
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

बढ़ई ने उसे हिकारत भरी नजरों से देखा. इतने छोटे से काम के लिए वह क्यों खूंटा चीरने लगा. काम भी छोटा और कहने वाली भी छोटी. फिर यह काम करने के लिए वह क्यों तत्पर हो, उसे तो कुछ मिलना नहीं है इससे. क्यों वह अपना वक्त बर्बाद करे. डांट कर उसे भगा दिया. बेचारी रुआंसी हो गई. अपमान का घूंट पीकर वह राजा के पास जा पहुंची और राजा से बढ़ई की शिकायत करते हुए कहने लगी,
“राजा राजा तू बढ़ई डांड़अ
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

राजा ने बेरुखी से गौरेया को देखा. इतने छोटे से काम के लिए कोई इतनी बडी हस्ती से कहता है क्या? राजा अब ये सब करने लगे तो हुआ बंटाधार. फिर ओहदे की अहमियत कहां रह जाएगी. फिर तो ऐरों-गैरों का तांता लग जाएगा और काम भी अगड़म-बगड़म. उसने गौरैया को इतनी जोर से डांटा कि बेचारी रोते-रोते रनिवास में रानी के कदमों पर जा गिरी. रानी से न्याय की उम्मीद में उसने चिरौरी की
“रानी रानी तू राजा छोड़अ
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

रानी को जो हंसी छूटी सो रुकने का नाम ही ना ले. फिर भी अपनी हंसी मुंह में दबाते हुए बोली, “प्यारी गौरैया, इतने मामूली काम के लिए कोई भी स्त्री क्या अपने पति को छोड़ देगी? यह राजसी ठाट, रनिवास का सुख, ऐशो-आराम, नौकर-चाकर, सुख सुविधाएँ, ठाट-बाट सब तो इसी राजा से है और तू कहती है छोड़ दूँ?’  नादान गौरैया, हठ ना कर. जा अपने काम पर लग. मैं तो राजा को छोड़ने से रही.”
गौरैया के दुख का पारावार नहीं. बड़ी उम्मीद थी उसे कि एक स्त्री दूसरी स्त्री के काम आवेगी पर रानी तो बड़ी स्वार्थी निकली. ऐसे पति का साथ निभा रही जो दम्भी है, अपने सुख के आगे उसे राजा की कर्तव्यहीनता दिखाई नहीं दे रही. इस रानी को मजा चखाना ही होगा.
दुख के मारे वह पहुंच गई एक सांप के पास और अनुनय विनय करते हुए बोली,
सांप-सांप तू रानी डसअ
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

सांप ना-नुकर करने लगा. बोला , बहन, मैं तभी किसी को डसता हूं जब मेरी जान पर बन आती है.  मैं इंसान नहीं कि बेवजह किसी को डसता फिरूं..ऐसा मेरा स्वभाव नहीं. इतने छोटे से काम के लिए बेचारे राजा को मैं रंडवा क्यों बनाऊं....ना बहन ...ना”
सांप से नसीहत सुन कर गौरैया का गला भर आया. मुंह में ज़हर रखने वाला जीव भी सच्चरित्रता का ढोंग कर रहा. पर इंसान के बारे में उसकी राय से वह कांप उठी. क्या सचमुच इंसान इतना भयानक है. नहीं..इंसान इतना गिरा हुआ नहीं हो सकता. यदि बेवजह वह किसी को डसता नहीं तो फिर इंसान आस्तीन में उसे क्यूँ छिपा कर रखता.....इस झूठे सांप को मज़ा चखाना ही होगा. वह दौड़ी-दौड़ी जा पंहुची लाठी के पास. और करने लगी अनुनय-विनय:

लाठी लाठी तू साँप मारअ
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

अब तक ना जाने कितनों के सर पर बरस कर लोगों का माथा घुमाया है उसने पर इस बार उसी का माथा घूम गया.  बूढ़ोंं का सहारा बन कर और घरों की रक्षा कर यश कमाने वाली को कैसा काम करने के लिए कह रही यह गौरैया. यह हत्या कर वह अपयश का भागी बनने को तैयार नहीं. उसने बहाना बना कर अपना पल्ला झाड़ लिया और गौरैया को झिड़क कर भगा दिया.
अब क्या करे गौरैया...कहां जाय...किससे कहे...इतनी बड़ी दुनिया में उसकी मदद करने वाला क्या कोई नहीं ..लाठी की लट्ठमार भाषा सुन उसे उसपर ऐसा गुस्सा आया कि मन हुआ कि लाठी के  सर पर एक लाठी दे मारे. इसको सबक सिखा कर ही वह मानेगी. और इस  खयाल से वह सीधा जा पहुँची आग के पास और लगी करने मान-मुनौवल:

“आग आग तू लाठी जारअ
लाठी ना साँप मारे   
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

आग तो सुनते ही आगबबूला हो गई. बोली ,यह क्या मजाक है, उस लाठी ने मेरा क्या बिगाड़ा कि उसे जला दूँ. देखो बहन, मेरा स्वभाव संयमित रहने का है. उच्छृंखल हो जाऊँ तो लाठी क्या पूरी सृष्टि ही जला कर राख कर दूँ. बेवजह मैं नहीं लपटती और ना ही धधकती. शांत पड़ी रहती हूं. मुझे हवा ना दे...जा यहां से”

गौरैया क्रोध की आग में जलने लगी. आग को सुनाते हुए बोली, “बस बस रहने दो...इतना झूठ ना बोलो..बड़ी आई संयमित रहने वाली...जंगल-जंगल जलाते देखा है तुझे. मेरे ना जाने कितने पुरखों का घोंसला उजाड़ा है तेरी लपटों ने..जरा उन गरीबों से पूछ कर देखो जिनके पेट में तू अनवरत धधकती रहती है..एक जून खाना जिसे नसीब ना हो, उसके पेट में ही नहीं, हृदय में और आँखों से भी बरसती रहती हो और गर्मियों में तो पंखों से भी...देख लूंगी तुझे”
यह कहकर वह सीधे समंदर के पास जा पहुँची और खूब गिड़गिड़ाई,

“समंदर समंदर तू आग बुझाव  
आग ना लाठी जारे 
लाठी ना साँप मारे  
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

समंदर ने भी औरों की तरह इंकार कर दिया. उसकी उच्छाल तरंगे इठलाती रहीं और ऊँची ऊँची लहरें बन तट की ओर दौडती और वापस समंदर में ही लीन हो जातीं. समंदर को अपनी लहरों और तरंगों का खेल इतना भाया कि उसने गौरैया को साफ कह दिया, “जा मुझे तंग ना कर...कहीं लहरों की चपेट में आ गई तो बेवजह जान से हाथ धोना पड़ेगा.”

गौरैया ने उसे धमकी दे डाली, “भले ही अथाह जलराशि का मालिक है तू, पर याद रख, तुझे धो डालूंगी” समंदर ने उसकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया, उसकी लहरें उछल कूद मचाती रहीं. उपेक्षित होकर गौरैया ने हाथी से कहना मुनासिब समझा,

हाथी हाथी तू समंदर सोखअ
“समंदर न आग बुझावे
आग ना लाठी जारे 
लाठी ना साँप मारे  
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

हाथी गला फाड़ कर हँस पड़ा और बोला“भोली बहन, ये क्या बीड़ा उठा लिया तूने? एक दाल के दाने के लिए इतने लोगों को सजा दिलाने पर तुली हुई है तू...बेवकूफी छोड़ और घर जा”

गौरैया ने कहा, “ तुझे मालूम भी है कि एक दाल के दाने की कीमत मेरे लिए क्या है? उस एक दाने में मेरे तीन बच्चों का पेट पल जाएगा. आज की रात वे भूखे नहीं सोयेंगे..बच्चे जब भूखे सो जाते हैं तब माँ के दिल पर क्या गुजरती है यह तू क्या जाने. तू तो मदमस्त है, मेरी ही मति मारी गई थी कि तुझे कहने आई.. खैर..तुझे भी देख लूँगी”
यह कह कर गौरैया जा पहुँची जाल के पास ....और कहने लगी,

“जाल जाल तू हाथी बाँधअ
हाथी ना समंदर सोखे
समंदर न आग बुझावे
आग ना लाठी जारे 
लाठी ना साँप मारे  
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

जाल तो बड़ा ही ढीठ निकला. उसने तंज कसते हुए कहा, “एक मैं ही तुझे बेवकूफ मिला....जब इतने महारथियों ने तुम्हारा साथ ना दिया तो मुझे क्या पड़ी है तुम्हारा काम करने को....जा मैं नहीं बाँधता हाथी को ...क्या कर लेगी तू”
अब क्या करे बिचारी गौरैया....अब कहाँ जाए वह...सारे रास्ते बंद नजर आने लगे...हताशा की घड़ी  आने लगी..सूरज भी पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चला था...कहीं सूर्यास्त हो गया तो खाली हाथ जाना पड़ेगा बच्चों के पास...कितना निराश होंगे बच्चे उसके...वे तो किसी तरह उससे लिपट कर सो जायेंगे पर क्या उसकी आँखों में नींद आ पायेगी ...बच्चे भूखे हों तो दुनिया की कोई भी माँ चैन से कभी सो सकती है भला...बच्चों को तो हर हाल में निवाला मिलना ही चाहिए...वह तो भूखे भी सो सकती है जैसा कई बार हुआ है उसके साथ...माँ है ना..  
तभी उसे अपने पुराने साथी चूहे की याद आई...वह उसकी जरूर मदद करेगा...पंचतंत्र में भी हिरण्यक चूहे ने ही जाल काट कर बहेलिया से चिड़ियों की जान बचाई थी. चिड़ियों और चूहे की दोस्ती आज की नहीं प्राचीन काल से चली आ रही. चूहे की याद आते ही वह उत्साहित होकर जा पहुँची उसके पास और बड़े ही कोमल स्वर में अनुरोध किया,

चूहा चूहा तू जाल काटअ
जाल ना हाथी बाँधे
हाथी ना समंदर सोखे
समंदर न आग बुझावे
आग ना लाठी जारे 
लाठी ना साँप मारे  
साँप ना रानी डसे
रानी ना राजा छोड़े 
राजा ना बढ़ई डांड़े 
बढ़ई ना खूंटा चीरे
खूंटा में दाल बा
का खाउं का पीउं
का ले के परदेस जाऊं”

चूहे ने पूरी बात सुनी. बोला, “बहन ...तुम्हारे बच्चों की सोच कर जी भर आया...यदि बढ़ई ने ही तुम्हारी मदद कर दी होती तो तुम्हें इतना ना भटकना पड़ता. आजकल के दफ्तर में फाइलों को कुतरते वक्त मैंने भी लोगों को अपना काम कराने के लिए टेबुल-दर-टेबुल भटकते देखा है. काम नहीं होने पर बड़े हाकिम के पास जब वे जाते हैं तो वहाँ भी उन्हें फटकार मिलती है... बड़े हाकिम कहते हैं, “सीधा मेरे पास कैसे चले आए...जाइये सम्बंधित अधिकारी से मिलिए”. ऊपर का खौफ खत्म हो चुका है और नीचे के लोग कान में तेल डाल कर बैठ गए हैं. पूरी प्रणाली में लाल फीताशाही है. खैर..इसी बहाने तुम्हें इतने लोगों के स्वभाव के बारे में तो जानकारी मिली. मुझे तो राजा पर अचरज होता है. जो राजा प्रजा का दुख दर्द ना समझे, जिसे प्रजा का कष्ट छोटा प्रतीत हो, फरियादी को छोटे तबके और शक्तिहीन समझ जिसकी उपेक्षा करे और जो अपने ओहदे के मद में चूर हो, उस राज्य की न्याय व्यवस्था कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. ऐसे ही राज्य की जनता का नैतिक और चारित्रिक पतन होता है और दूसरों की मदद करने की प्रवृत्ति घटती है..बहन...काटना और कुतरना तो मेरा स्वभाव है...बिना कुतरे मेरे दाँतों को आराम नहीं मिलता...मैंने अच्छी-अच्छी किताबें कुतर डाली हैं...कागज और किताबों के बाद जाल ही मेरी प्रिय वस्तु है जिसे कुतरने और काटने में मुझे बडा ही आनंद मिलता है...चलो...कहाँ है जाल...अभी काट कर तुम्हारी मदद ना करने की सजा देते हैं”

गौरैया के साथ चूहे को आता देख जाल सहम गया. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक अदना सी गौरैया वैसे व्यक्ति को ले आएगी जो उस पर भारी पड़ेगा. नजदीक आकर गौरैया ने चूहे से कहा, “ये रहा जाल, इसे ही काटना है...इसी ने कहा था क्या कर लेगी तू...चूहा भाई इसे काट कर मजा चखा दे” यह सुनते ही जाल हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और कहने लगा,

हमरा काटअ ओटअ मत कोई
हम हाथी बाँधब गोई

गौरैया ने हाथ के इशारे से चूहे को रोक दिया..अब तीनों चले हाथी के पास...जाल हाथी को बाँधने की तैयारी करने लगा तो हाथी ने अनुनय-विनय किया,

“हमरा बाँधअ ओंधअ मत कोई,
हम समंदर सोखब गोई”

समंदर ने जब गौरैया को चूहा, जाल और हाथी के साथ आते देखा, तो सारा माजरा समझ गया. वह तो शुरु से घमंडी था. त्रेता युग में एक बार उसका घमंड रामजी ने तोड़ा था और इस युग में यह गौरैया. जरूर रामजी ने गौरैया को आशीर्वाद दिया होगा. उसने हाथ जोड़ते हुए हाथी से कहा,

“हमरा सोखअ ओखअ मत कोई,
हम आग बुझावब गोई”

समंदर के छींटे जब आग पर पड़ने लगे और अपना अस्तित्व संकट में दिखने लगा तो आग ने भी आत्म समर्पण कर दिया. उसने भी माफी माँगी और लाठी को जलाने के लिए तैयार हो गया. मगर जलाने के पहले उसने गौरैया से कहा,

“देख, मैंने झूठ नहीं कहा था. इर्ष्या की आग, हृदय की ज्वाला, किसी की आँखों से निकलती हुई मेरी लपटें ये सब दुनिया के जितने भी प्रपंच तुझे दिखते हैं उसके मूल में एक ही कारण है और वह है जठर की अग्नि. जठर की अग्नि यदि वक्त पर शांत हो जाए तो सारे प्रपंच अपने आप खत्म हो जायें. तू भी जो इतनी मेहनत करती है और आज भी कर रही है उसके पीछे पेट की आग बुझाने का ही तो मकसद है..इस पेट की आग बुझाने के लिए हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह इसके लिए मेहनत मशक्कत करे, ना कि निठल्ला बैठा रहे और राजा की तरफ टुकुर टुकुर देखता रहे कि वही अन्नदाता हैं, वही मदद करेंगे. निष्क्रिय लोगों की भीड़ किसी भी देश के राजा के लिए बोझ हैं....चल इस लाठी की खबर ली जाए..और फिर आग ने समंदर की ओर मुखातिब होकर कहा,

‘‘हमरा बुझावा उझावा मत कोई,
हम लाठी जारब गोई”

लाठी ने आग की तपिश जो महसूस की तो उसने पीछे मुड़कर देखा..गौरैया के साथ इतने लोगों का जमावड़ा देखकर उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. पाँच बार तो आँखें मल कर देखा और जब सब माजरा समझ में आ गया तो माफी माँगते हुए बोली,

“हमरा जारअ ओरअ मत कोई
हम साँप मारब गोई “

फिर बोली, यह सही है कि सदियों से लोग साँप मारने के लिए लोग मेरा ही इस्तेमाल करते आए हैं पर आजकल हम बेवजह साँप मारना छोड चुके हैं. अब तुम ही सोचो...कोई इत्मीनान से अपने रास्ते चला जा रहा हो और कहीं से एक लाठी उसके सर पर पड़े तो क्या यह उचित होगा. छ्ल से किया हुआ वार पाप है. एक दूसरे का सर फोड़ने के लिए भी मेरा ही इस्तेमाल करते आए हैं लोग और आजकल पुलिस के लिए तो मैं ही सबसे प्यारी वस्तु हूँ...जब देखो लाठी चार्ज करते रहती है मानो इंसान का शरीर हाड़-माँस का नहीं बल्कि गद्दे का बना हो...रुई की तरह धुन देती है उनके शरीर को. पर बेवजह सम्पत्ति नष्ट करने वाले उपद्रवियों पर बरसने में मुझे खूब मजा आता है. तुमलोगों ने समझाया तो अब समझ में आ गया. तेरे नेक काम के लिए मैं साँप मारूँगी...चल...”

गौरैया को लाठी के साथ आता देखकर साँप चकित हो गया. नजदीक आकर गौरैया ने लाठी से कहा,
“यह वही साँप है जिसने रानी को डँसने से इंकार किया, सर कुचल दे इसका”

साँप ने हाथ जोड़े, कहा, मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारे काम में इतने लोग सहयोग कर रहे हैं. अनीति का साथ निभाने वाले भी अनीति की राह पर चलने वाले होते हैं. ऐसी रानी को डँसना ही होगा जो अन्यायी राजा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं. उसने लाठी का मान-मनोव्वल करते हुए कहा,

“हमरा मारअ-वोरअ मत कोई,
हम रानी डाँसब गोई”

अब साँप चला रानी को डँसने. लाठी भी साथ हो ली. गर ऐन वक्त पर डँसने से इंकार किया तो सर फोडने में देर नहीं करेगी. लाठी और साँप के साथ गौरैया को देखकर रानी का माथा ठनका. काला भुजंग देखकर रानी के तो होश उड़ गए. मृत्यु सामने देखकर चक्कर खा गई और सुख सुविधा भी हाथ से निकलता दिखाई देने लगा. उसने अविलम्ब साँप से विनती की और कहा,

“हमरा डाँसअ वाँसअ मत कोई
हम राजा छोड़ब गोई”

राजा को जैसे ही भनक लगी कि रानी उसे छोड़ने वाली है, उसके अचरज का ठिकाना ना रहा. कारण तो पता चले. तुरंत रनिवास की तरफ दौड़ पड़ा. वहाँ गौरैया, लाठी और साँप पहले से ही मौजूद थे. गौरैया को देखते ही राजा उसे पहचान गया. उसे सब कुछ याद आ गया. गौरैया की फरियाद की भी याद आ गई. फिर रानी से उसने कहा,, यह क्या सुन रहा हूँ? इस गौरैया के कारण तूने मुझे छोड़ने का निर्णय लिया है क्या ?”
रानी ने कहा, “आपको ना छोड़ूँ तो यह साँप मुझे डस लेगा” और फिर सारी कहानी राजा को बताई. राजा सर पकड़ कर बैठ गया. फिर रानी ने कहा, “मृत्यु के भय ने मुझे राजा के कर्तव्य का ज्ञान दिया. राजा के समक्ष छोटे बड़े का भेद नहीं होना चाहिए. राजा का कर्तव्य है कि उनकी न्याय व्यवस्था ऐसी हो कि समाज का छोटे से छोटा व्यक्ति उनके संरक्षण में अपने को सुरक्षित महसूस करे. जिस राजा को अपनी प्रजा के दुख दर्द से कोई मतलब ना हो उस राजा की सहचरी बन मैं अपयश की भागी नहीं बनना चाहती, इसलिए बेहतर है कि मेरे और आपके रास्ते अलग हो जायें.“
राजा को काटो तो ख़ून नहीं. रानी का हाथ पक कर बोला, “भाग्यवान, तूने तो मेरी आँखें खोल दीं. मेरी ही ढिलाई से बढ़ई को हिम्मत हुई कि उसने गरीब की मदद नहीं की. दुख इसी बात का है कि  मृत्यु के भय से ही सभी को कर्तव्यबोध हुआ जबकि परोपकार एक स्वाभाविक वृत्ति होनी चाहिए . फिर रानी को खूब मनाया,

“हमरा छोड़अ वोड़अ मत कोई,
हम बढ़ई डाड़ब गोई”

राजा ने हरकारा भेज कर बढ़ई को दरबार में हाजिर होने के लिए आदेश दिया. बढ़ई हकासे-पियासे दौड़ा आया और औंधे मुँह राजा के चरणों पर गिर कर प्राणों की भीख माँगने लगा. गौरैया पर नजर पड़ते ही बढ़ई ने कहा, “जहाँपनाह, मैं अभी खूँटा चीर कर गौरैया को दाल का दाना दिलाने में मदद करता हूँ.
बढ़ई ने खूँटा चीरा और गौरैया ने दाल का दाना अपनी चोंच में लिया और उड़ चली अपने बच्चों के पास...खुशी से झूमते...उछलते..उमगते.


कहानी खत्म हुई. गौरैया को न्याय और उसके बच्चों को भोजन मिल जाने की तसल्ली से नानी की गोद में मुन्ना भी गहरी नींद में सो चुका था.

3- 

आदरणीय अनीता मिश्राजी का आलेख पढा. पीरियड्स से जुडी मानसिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं धार्मिक समस्याओं पर हमारा ध्यान आकृष्ट हुआ इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं. बिहार जैसे पिछडे राज्य में यदि पीरियड्स लीव की घोषणा होती है तो  निश्चय ही कहा जा सकता है कि यह राज्य वैचारिक दृष्टिकोण से काफी प्रगतिशील है. दो दिनों की छुट्टी दे कर महिलाओं को कमतर आँकने के लिए नहीं परंतु पीरियड्स से जुडी समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक जागरूकता के तहत इन छुट्टियों की घोषणा हुई है. परंतु इतना कुछ होने पर भी मासिक स्राव की चर्चा करना आज भी एक ग्रंथि है जिसे तोडना आवश्यक है. यदि यह टैबू ना होता तो हमारे देश की  विज्ञापन कम्पनियाँ सेनिटरी नैपकीन का प्रचार करते वक्त मासिक रक्त स्राव के रंग को नीला नहीं दिखाती. अनुराधा सिंघ जी का यह कहना कि इस क्षेत्र में सौ प्रतिशत बदलाव स्त्रियों को लाना है, बिल्कुल सही है. इस संदर्भ में तिरुपती निवासी युवा प्रतिभाशाली लेखिका रम्या मडाली का आलेख ( शीर्षक women don’t bleed blue) जो अंग्रेजी की उत्कृष्ट पत्रिका ओपन में छपा, उद्घृत करना चाहूँगा जिसमें लेखिका ने कई ऐसे विचारोत्तेजक प्रश्न उठाए एवं दृष्टांत दिए जो हमें विस्मय में डाल देते हैं जैसे, लेखिका को तेरह साल की उम्र में जब पहली बार पीरियड आया तो उन्हें बडों के पाँव छूने के लिए कहा गया क्योंकि मान्यता के अनुसार अब वे एक छोटी दुल्हन का रूप धारण कर चुकी हैं. उनकी चाची ने उन्हें बताया कि यदि किसी ऐसे अशुभ समय में उनके माता-पिता उनकी शादी के पहले ही चल बसे तो आज अपनी बेटी को छोटी दुल्हन के रूप में देख लेने से उन्हें मलाल ना होगा.
पुन: सामाजिक एवं धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि पीरियड्स के दौरान स्त्री अपवित्र मानी जाती है क्योंकि उसका प्रवेश  मंदिर, पूजा घर, रसोई घर आदि जगहों में वर्जित होता है तो लेखिका ने अपने बाल-सुलभ तर्क रखे कि इस दौरान किसी भी स्त्री को सबसे पवित्र माना जाना चाहिए क्योंकि अब वे गर्भवती हो सकती है और माँ बनना दुनिया की सबसे पवित्र एवं दैवी घटना है. उसी तरह यदि सामाजिक तर्कों के अनुरूप यदि पवित्रता का सम्बंध सच्चरित्रता से जोडा जाए तो पीरियड्स का होना सच्चरित्रता का सबसे बडा प्रमाण माना जाना चाहिए. इस लेख का लिंक मैं दे रहा हूँ जो सर्वथा पठनीय है.  http://www.openthemagazine.com/article/tru-life/women-don-t-bleed-blue
इसी संदर्भ में एक और जानकारी देना चाहूँगा. कोयम्बटूर निवासी श्री अरुणाचलम मुरुगनंथम (1962 में जन्म) जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ने भारत में सर्वप्रथम कम लागत की सेनिटरी नैपकिन बनायी. उनकी सफलता की कहानी भी कम विस्मयकारी नहीं है. समयाभाव के कारण कहानी का विस्तार आज मैं नहीं दे पा रहा. फिलहाल इतना ही कि वे दुनिया के प्रथम पुरुष हैं जिन्होंने स्वयम सेनिटरी नैपकीन लगा कर प्रयोग किए. जब उन्होंने अपनी पत्नी को पीरियड्स के दौरान अखबार और पुराने चीथडे कपडे  व्यवहार करते हुए देखा तो उन्होंने इस अन-हाइजेनिक तरीके से लडने की ठानी. कृत्रिम यूरिनरी ब्लैडर लगा कर कई बोतल खून के साथ तमाम विरोधों, उपेक्षाओं और सामाजिक वहिष्कारों को झेलते हुए उन्होंने अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों में सफलता पाई और व्हीस्पर्स और स्टेफ्रेश जैसे कमर्शियल उत्पाद के सामने बिल्कुल एक तिहाई कीमत पर उन्होंने कम लागत की हायजेनिक सेनिटरी नेपकीन बाजार में उतारा जो भारत के उनतीस राज्यों में से 23 राज्यों में प्रचलित है. 2014 में टाइम मैगजीन ने उन्हें दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में स्थान दिया तथा 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

4- 


1972

वह जब भी आता, कुछ न कुछ नया शगूफा अवश्य छोडता. हमें हैरत होती, हमारा हमउम्र पर इतना ज्ञान, इतनी गहरी सोच और विचारों की इतनी गहरी परिपक्वता. कभी हम प्रभावित होते तो कभी ईर्ष्या करते. ईर्ष्या इसलिए करते कि यही सबसे आसान तरीका था उससे बराबरी ना कर पाने की घुटन पर विजय पाने का. उसकी बातों को अनसुना कर देना, उसपर डींगे हाँकने वाला का टिप्पा लगा देने के सिवा हमारे पास कोई विकल्प न था. उसके आते ही हम सब फुसफुसाने लगते, देखो, आज क्या नया छोडने वाला है वह और एक दिन उसने हम सबों को दिखाया एक खूबसूरत डाक टिकटों का अलबम. पूछने पर बताया, एक ठेले पर कागज की कतरनों की गठरियाँ जा रही थीं, उस ठेले के पीछे कई बच्चे कतरन खींचते दौड रहे थे. ठेले वाला इस बात से अनभिज्ञ ठेला खींचे चला जा रहा था. मैंने भी एक गठरी में हाथ घुसाया तो टिकटों का यह अलबम निकला’. उसके इस कथन से पहली बार हमारे जेहन में दो भाव एक साथ आए. हम प्रभावित भी हुए और उससे खूब ईर्ष्या भी हुई. हमने भी कई बार बैलगाडियों से पुआल खींचे हैं, ठेलाओं से कागज की कतरनें सडकों पर बिखराए हैं, मलबे बीनने वालों की बोरियाँ तलाशी हैं, पर हमारे हाथ कभी भी अच्छी चीजें नहीं लगीं. पर उसकी किस्मत देखो, पहली बार में ही किस्मत उस पर मेहरबान हो गई और कूडे की ढेर से उसे कीमती डाक टिकटों का संग्रहणीय अलबम मिल गया.

ये बातें बचपन की हैं.

1974

वक्त बीता. कुछ वर्षों बाद मैंने उससे पूछा था, क्या तुम्हें सचमुच टिकटों का अलबम कबाडी के ठेले में मिला था?’

वह मुस्करा उठा, नहीं..! कई वर्षों से मैं डाक टिकटें कलेक्ट कर रहा था. कई मित्रों से टिकटें एक्स्चेंज भी होते थे. फिलेटली का शौक था. इस हॉबी से देश दुनिया के बारे में सामान्य ज्ञान मेरा बढा है. सारे देशों की करेंसी के साथ-साथ उसकी राजधानी मुझे याद है.

फिर तुमने झूठ क्यों कहा था?’


वह इसलिए कि जब मैंने यह बताने की कोशिश की कि नीदरलैंड को ही हॉलेंड भी कहा जाता है, हंगरी की टिकटों पर मगयार पोस्टा लिखा होता है और ग्रीनलैंड में हरा कुछ भी नहीं तो सबने मुझे अनसुना किया और मेरा मजाक उडाया. मैंने सोच लिया कि ऐसे दोस्तों की परीक्षा ले ली जाए. क्या वे अगडम-बगडम की चीजों में उलझते हैं या अलबम देखकर खुद इस हॉबी को अपनाते हैं और ज्ञान हासिल करते हैं. मुझे दुख है कि सभी ने ठेलाओं के पीछे भागना उचित समझा, किसी ने देश और उसकी राजधानी याद नहीं की. माफ करना, तुमने भी नहीं.


1974-1979

यह दौर मेरे लिए अनिश्चितता का दौर रहा. करियर बनाने के वर्ष थे ये. जेपी आंदोलन के बाद विश्वविद्यालय में सेशन विलम्ब से चलने लगे. ऊँचे सपने थे और बुलंद हौसले भी. पर मेरे सपने धीरे-धीरे बिखर गए.

1980-2002

नौकरी में आ चुका. इन वर्षों में ख़ूब सामान इकट्ठा किए मैंने. अनावश्यक चीजों का जमावडा हो गया घर में. आवश्यक चीजें भी आवश्यकता से अधिक लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई. किताबें खरीदीं तो नियम से प्रतिमाह एक से दो हजार की पुस्तकें आती रहीं. आलमारियाँ भर गईं. बुक सेल्फ खरीदे गए. कई किताबें पढ डाली और कई बीस सालों से यूँ ही ज़िल्द लगी बुक-सेल्फ की शोभा बढा रही हैं.

संगीत सुनने के शौक ने केसेट्स खरीदने को मजबूर किया. अनगिनत केसेट्स. गज़लों के, गीतों के, चुनिंदा गायकों के, तो विभिन्न वाद्य यंत्रों के क्लासिकल संग्रह भी.

जूते खरीदे तो अनगिनत. लेस-वाले तो बिना फीता के. ब्लैक तो ब्राउन भी. स्पोर्ट शू तो केट्स भी. चप्पलें भी. एक बार घर बदलते वक्त पैकर ने कह डाला कि आपके घर से सबसे ज्यादा जूते और किताबों के ही कार्टन निकले.

और कपडे ? इनका तो कोई हिसाब ही नहीं. बाई टू गेट वन फ्री की सेल लगी हो तो जैसे ज़ेब में खुजली होने लगती थी. हाथ अनायास ही वैलेट की तरफ चले जाते थे.

ये तो हुई भौतिक वस्तुओं के संग्रह की बातें. बौद्धिक स्तर पर भी मस्तिष्क में कई विचारों का संग्रह हुआ. गाँधीजी की जीवनी पढी तो सत्य और अहिंसा के विचारों का मन में संचार हुआ. फिर यशपाल, मन्मथ नाथ गुप्त आदि की लिखी हुई क्रांतिकारियों की गाथा पढी तो क्रांतिकारी विचारों से हृदय ओत-प्रोत हो गया. धर्मवीर भारती का लिखा हुआ गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का लघु उपन्यास तुम्हारे लिए पढा तो, प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो गया.

नया-नया टीवी आया घर में. चिपक सा गया छायागीत में तो कभी सिरियलों में, सिनेमा में तो क्रिकेट मैच में, फिल्मफेयर अवार्ड में तो समाचारों में. उन दिनों वयस्कों के लिए रात्रि ग्यारह बजे स्टार प्लस में बे-वाच आया करता था या लास वेगास के उत्सव, जिसे देखने के लिए आँखें नींद से बोझिल होने पर भी जगती थीं.   

2003-2004

वर्षों बाद जब ख़बर मिली कि मेरा मित्र एक बहुत ऊँचे ओहदे पर है तो मुझे कोई हैरत नहीं हुई क्योंकि पूत के पाँव पालने में ही पहचाने जाते हैं. मैंने उसे बधाई संदेश भेजा. विनम्रता की मूर्ति उसने मेरी खैरियत पूछी. मैंने पूछ डाला, टिकटें जमा करने की हॉबी बरकरार है या वक्त के साथ भूल गए.

उसने कहा, मैंने अपना अलबम भतीजे को गिफ्ट कर दी थी. मेरा जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया इसलिए अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं. देशों की राजधानी याद करना अब मेरे लिए माएने नहीं रखता. अब तो कई देशों की यात्रा कर डाली है मैंने.

हमारे अनगिनत मित्रों में बचपन के सभी मित्रों की सबसे बडी विशेषता यही है कि मित्रता में पद कभी आडे नहीं आया. वही बेलौस बातचीत, वही ठहाके और वही तुम...तू...का आलम और कहा-कही. जो सामान्य रहे, वे कभी कभार यह चर्चा जरूर करते कि आखिर फलाँ में ऐसी क्या बात थी जो वह प्रगति एवं उपलब्धि के उच्च शिखर पर जा पहुँचा और हम सब हाथ-पाँव ही मारते रह गए. उनके इस प्रश्न का उत्तर मैं उस मित्र के डाक टिकट के अलबम वाले प्रसंग से देता, “क्योंकि हम सब कागज की कतरन बटोरने में ही लगे रहे और उनलोगों ने अलबम हासिल किया. सफल व्यक्ति अनावश्यक चीजों के प्रति आकर्षित नहीं होता.”

2005-2007

मेरे वक्तव्य में दो चीजें उभर कर सामने आईं, एक सफलता और दूसरी आवश्यक-अनावश्यक चीजें. दोनों शब्द गूढ हैं. जिसे हम सफल होना समझते हैं, वह क्या वाकई सफलता की परिभाषा है. क्या कोई पद हासिल करना ही सफलता है या उससे आगे कुछ और पाना बाकी रहता है. उसी तरह आवश्यक और अनावश्यक में क्या आवश्यक है और क्या अनावश्यक, इस पर विचार करना जरूरी है.

एक गम्भीर बीमारी में लीलावती अस्पताल, मुम्बई में भर्ती होना पडा. अब तक की जीवन शैली में पहली बार महसूस हुआ कि,

“आगाहे अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस का, पल की ख़बर नहीं”

2007-2012  

प्रत्येक वर्ष चेक अप के लिए बम्बई जाना पडा. स्वास्थ्य लाभ करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अपनी जीवन यात्रा सुगम करनी हो तो सामान कम करना होगा. हमें अनावश्यक चीजों के संग्रह से बचना चाहिए. पुरानी चीजों का परित्याग करना चाहिए.
इस सोच के मुताबिक हमने अपने पुराने कपडे गरीबों को दे दिए. जाडों में स्वेटर और ऊनी कपडे जरूरतमंदों में बाँटे. कपडों के अतिरिक्त बर्तन और पुस्तकें भी जरूरतमंदों को दिए. संग्रह की प्रवृति छोडने की दिशा में हर सम्भव कदम उठाए. नेत्रहीन बच्चों के स्कूल से जुडा. एक जुनून सा दिलो-दिमाग पर हावी हो गया. कोई भी चीज खरीदने की हसरत नहीं रही. घर के लोग मुझसे घबराने लगे. जो चीज मुझे नागवार लगती किसी को दे देने में मैं देरी नहीं करता. और मज़े की बात यह कि ज्यादातर चीजें नागवार ही लगती.  किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रही. एक दिन वार्डरोब के एक दराज़ में अपने  संग्रह किए केसेट्स दिखे. सीडी और उसके उपरांत कम्प्यूटर और मोबाइल में संगीत आने से करीब पाँच सौ केसेट्स आलमारी में पडे-पडे अपनी बेबसी पर आँसू बहाते लगे. उनकी उपयोगिता देखते देखते शून्य हो गई. मेरी अनासक्ति और अधिक बढ गई. यहाँ तक कि खाने-पीने में भी कोई रुचि नहीं रही. छप्पन भोग देखकर भी मुँह में पानी नहीं आता. शादी का निमंत्रण या भोज-भात का आकर्षण खत्म हो गया. पत्नी के कान खाने की तारीफ सुनने के लिए तरसते तरसते उम्मीद छोड बैठे और वह भी मास्टर पंकज  शेफ से सलाह लेने का विचार छोड रसोईघर से सन्यास ले बैठी. Cuisine और Gourmet जैसे शब्द मेरे शब्दकोष से माएने खो बैठे.

2012

पर यह तो एक Obsession हो गया. एक जुनून या पागलपन. दुनिया एक मेले का नाम है  और जब तक जान है, मेले से बाहर मैं रह नहीं सकता. इस मेले की चीजें हमारा दिल लुभाती रहेंगी, बहलाती रहेगी. दुनिया आकांक्षा और तृष्णा है. वासना और कुछ होने की चाहत है.  मैं पुन: मेले में वापस आ गया. बाज़ार से ज़माने की चीजें मैं फिर खरीदने लगा,पर इतना अवश्य है कि एहतियात के साथ. अब कोई संग्रह नहीं, कोई जमावडा नहीं. Clutter मुक्त.

परंतु क्या इतना काफी है. भौतिक चीजों के साथ हमारे मस्तिष्क में पुरानी सोच का भी जमावडा है जिसे हमें समय रहते सफाई करनी होगी, खासकर पुरानी तल्ख यादों और निगेटिव विचारों का जो मस्तिष्क में जडें लगभग जमा चुकी हैं या जमाने के लिए आतुर बैठी हैं.

इन्हीं सोच-विचारों के साथ एक दिन मैं अपनी छोटी सी लाइब्रेरी में आलमारियों में सजी पुस्तकें पलट रहा था. इन पुस्तकों को मैंने पचीस तीस सालों से सहेज कर रखा है. एक रैक में कोर्स की किताबें भी रखी हुई हैं. मुझे खयाल आया कि कॉलेज के दिनों में हम हर चैप्टर पर आठ-दस किताबों से नोट बनाते थे. वो ज़माना सब्जेक्टिव विषयों का था. आज के पाठ्यक्रम में मेधावी छात्र सिर्फ विषय वस्तु समझ लेते हैं. गूढ सिद्धांतों को आत्मसात कर लेते हैं, फिर किताब की तरफ नजर उठा कर नहीं देखते. वे अनावश्यक पृष्ठों में नहीं उलझते.

विद्यारण्य ने जो चौदहवीं सदी के विजयनगर साम्राज्य में थे, अपनी पुस्तक पंचदशी में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया है. जैसे कोई व्यक्ति चावल की खोज में है, वह धान को लेता है, इसे कूटता है, भूसों को फेंक देता है और पकाने-खाने के लिए चावल ले लेता है इसी प्रकार मेधावी पहले पुस्तकों का अध्ययन करता है, ज्ञान-विज्ञान के प्रति तत्पर हो कर ज्ञान हासिल करता है और सभी पुस्तकें पढने के बाद उसे त्याग देता है.

श्रीरामकृष्ण परमहंस भी एक रोचक प्रसंग में कहते हैं,

एक व्यक्ति ने शहर में किसी सम्बंधी को पत्र लिखा, जब तुम वापस गाँव आओ, तो इतनी मिठाइयाँ और इतना कपडा इत्यादि लेते आना. और फिर उस सम्बंधी ने पत्र कहीं इधर-उधर रख दिया और सारे घर में उसे खोजने लगा. बडी कठिनाई से वह उस पत्र को खोज पाया. फिर पत्र पढने के बाद फाड कर फेंक दिया, दुकान पर गया, और वे वस्तुएँ खरीदीं जो उसमें लिखी थी. पत्र को रखने का क्या उपयोग है, अथवा उसे बार-बार पढने का? मुख्य बात तो उसमें लिखी वस्तुएँ प्राप्त करनी है.

2013.

आवश्यक और अनावश्यक के बीच फर्क कर पाना क्या इतना आसान है? विद्यारण्य और श्री रामकृष्ण के उपदेशों से प्रभावित होकर मुझे पुस्तकों का बोझ ही सबसे भारी लगने लगा. इसलिए बुक-सेल्फ में रखी बहुत सी किताबों का ज़रूरत-मंदों में वितरण करने लगा. उपन्यास और कहानियाँ जो संसार की माया में उलझाती हैं, उसे दोस्तों के जन्मदिवस पर दे दिया.

आध्यात्मिक पुस्तकें खरीदी. रामचरितमानस और गीता पढने लगा. बाबाओं के प्रवचन सुने. स्टार-प्लस छोड आस्था और संस्कार चैनल देखने लगा. वानप्रस्थ आने के पहले ही सन्यास आश्रम में प्रवेश कर गया. परंतु साल के अंत में ज्ञान हुआ,

“फलसफी को फलसफा में ख़ुदा मिलता नहीं,
डोर सुलझा रहा हूँ पर सिरा मिलता नहीं.’’


2014.

भटकन है जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही. पुस्तकों के मोह-जाल में पुन: फँसा. आदतें आसानी से कहाँ जाती हैं. एक पुस्तक पर नज़र पडी. शीर्षक था “कबीर”. पन्ने पलटने लगा. एक दोहा मिला,
“साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप स्वभाय
        सार सार को गहि रखे, थोथा देय उडाय” .. कबीर

यानी साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए जो सारतत्व को अपने पास रखता है और थोथा को उडा देता है. कबीर के इस दोहे में लिखे सार और थोथा में सार क्या है और थोथा क्या, यह समझना आसान है क्या ? क्या सिद्धांतों को महज आत्मसात कर लेना ही काफी है या उससे आगे की यात्रा भी करनी होगी. हमारा उद्देश्य एक विद्वान बनना नहीं है. उद्देश्य आध्यात्मिकता है. श्री रामकृष्ण कहते हैं, बिना आध्यात्मिक रुझान के विद्वानों का व्यवहार गिद्धों जैसा होता है, ऊपर आकाश में बहुत ऊपर उडते हुए भी उनकी दृष्टि पृथ्वी पर पडी हुई लाशों पर होती है.

इसलिए हमारी यात्रा तो अभी काफी लम्बी है. आगे की यात्रा में स्वयं का अनुभव करना आवश्यक है.

2015

आगे की यात्रा के लिए इस वर्ष का रिज़ोल्यूशन रहा, आत्मचिंतन.

रामकृष्ण कहते हैं ”हिंदू पंचांग में बताया गया है कि इस वर्ष इतनी वर्षा होगी. लेकिन यदि आप पंचांग लेकर उसे निचोडें तो आपको एक बूँद भी पानी नहीं मिलेगा. उसी तरह हमारे वेद जिन्हें हम सर्वाधिक पवित्र ग्रंथ मानते हैं, परंतु उन्हें हम सर्वोच्च स्थान नहीं देते. उनमें सत्य नहीं है, वे केवल सत्य के बारे में जानकारी मात्र देते हैं. वेदों को निचोडने से ऐसा कुछ नहीं मिलेगा. केवल अपने स्वयं के अनुभव को निचोडने से ही सत्य मिलेगा और सत्य का अनुभव होगा. बृहदारण्यक उपनिषद में एक क्रांतिकारी वक्तव्य है: वेदो अवेदो भवति अर्थात जब कोई सत्य की प्राप्ति करता है, वेदो का मूल्य समाप्त हो जाता है. अत: वेदों का उपयोग करो, शास्त्रों का उपयोग करो, समझो कि वे क्या कहते हैं और फिर स्वयं के अनुभव का प्रयास करो. अनुभव उससे कहीं ऊँचा है जो केवल पुस्तकों में दिया गया है. जो कुछ पुस्तकों में है उसे ग्रहण करके त्यजेत ग्रंस्थम अशेषत:, समस्त पुस्तकें फेंक दो’, उनका आगे कोई उपयोग नहीं है” कबीर का सार यही है.

सभी धर्मों के रहस्यवादियों ने यही किया है. जब उन्होंने सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया, उन्हें पुस्तकों की क्या आवश्यकता रह जाती है? रूमी भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मस्नवी में कहते हैं,
मन ज़े क़ुरान मग्ज़ रा बर्दास्तम;
उस्तुख़ान पेसे सगाँ अन्दख्तम-

यानी क़ुरान में से मज्जा मैंने खींच ली है और सूखी हड्डियाँ कुत्तों के लिए फेंक दी है’.

केवल आध्यात्मिक पुस्तकें पढने से कोई आध्यात्मिक नहीं होता. पुस्तकों की उपयोगिता केवल समस्या को समझने के लिए है. जब हम विद्यार्थी से प्रयोगकर्ता बन जाते हैं तो हम पर से पुस्तकों का नियंत्रण कम से कम होता चला जाता है और तब हम जीवन के द्वंदों से मुक्त पूर्णत: स्व-स्थित, बिना किसी उत्कंठा या चिंता के, अपने अंदर की आत्मा की शक्ति में स्थित हो जाते हैं.

हमें यही तो प्राप्त करना है.

2016.

चौथेपन में प्रवेश कर रहे हैं हम. जीवन की यात्रा में हमें जो बनना था, हम बने और अपने अपने गंतव्य की ओर बढ रहे हैं. हमें कुछ और पाने की चाहत, कुछ और बनने की चाहत के जाल से मुक्त होना होगा. क्योंकि इसमें तृप्ति नहीं है. इस जीवन की यात्रा में अपना बोझ खुद उठाना होता है. इसमें कोई कुली नहीं मिलता, इसलिए इस यात्रा को सुगम बनाने के लिए सामान कम करना आवश्यक है. सर पर बोझ लादे फिरने से यात्रा का आनंद बिखर जाएगा. इस उम्र में जीवन के प्रति चिंतन भी आवश्यक है. किताबों से परे हमें आत्म चिंतन करते हुए सत्य के अनुभव को प्राप्त करना है. संसार और परमात्मा के बीच अंतर जानना होगा. सुख की खोज में भटकने वाला भ्रांत मन सांसारिक चीजों में उलझा रहता है. हमें प्रकृति से समझना होगा. हरियाली, पहाड, नदी, समंदर, पेड-पौधे, जंगल, धूप, हवा, पानी, बादलों के बदलते रंग को निहारते हुए अपनी आत्मा में असीम सौंदर्य भरना होगा. तभी हम जो है, जैसा है उसकी स्वीकृति दे पायेंगे और यही परमात्मा का अर्थ है. इसके लिए किताबें छोडनी होगी और बाहर प्रकृति की गोद में विचरण करना होगा. निदा फाज़ली को शायद इसका इल्म हो गया था तभी तो उन्होंने लिखा,

“धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो”

इस चिंतन के विस्तृत आकाश में पहली उडान भरने के लिए मैं अपने पर तौल रहा हूँ और इस निष्कर्ष पर पहुँच रहा हूँ, आवश्यक की खोज तथा अनावश्यक का परित्याग’.

इस दिशा में हमें अपने कदम बढाने ही होंगे तभी उडान सम्भव है वरना अपने ही इकट्ठा किए  सामानों के बोझ से हम उडान नहीं भर पायेंगे और गिर जायेंगे.

5- 

            
1

आठ जुलाई उन्नीस सौ सैंतालिस हिंदुस्तान की सरज़मीं पर ब्रिटिश सरकार के एक मुलाजिम ने पहली बार कदम रखा. नाम था सर साइरिल रैडक्लीफ. कानून का प्रोफेसर. उसे सिर्फ पाँच सप्ताह में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद तय करने की जिम्मेदारी दी गई थी. सरहद के समीपवर्ती गाँवों की शांति और भाईचारा की जवाबदेही एक ऐसे व्यक्ति के फैसले पर निर्भर हो गई जिसने कभी हिंदुस्तान नहीं देखा था. फैसला पंद्रह अगस्त तक कर लेना था कि कौन सा प्रांत हिंदुस्तान की झोली में डाला जाय और कौन सा पाकिस्तान का हिस्सा बने. कलकत्ता पाकिस्तान बने कि लाहौर हिंदुस्तान.

सरहद की रेखाएं खींचने के लिए हालाकि दूसरे पहलू जैसे नदी-नाले, खेत-पहाड, उद्योग और सैनिक छवनी इत्यादि भी उसे ध्यान में रखने थे, परंतु धर्म ही मुख्य आधार बना. मुस्लिम लीग की माँग भी यही थी. जिन्ना की ज़िद थी कि मुस्लिम जिनके रीति-रिवाज, भाषा, रहन-सहन, सोच-विचार सभी कुछ हिंदुओं और सिखों से बिल्कुल अलग हैं, हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक बन कर नहीं रहेंगे. उन्हें अपनी सरज़मीं चाहिए जहाँ उनकी हुकूमत हो.

रैडक्लीफ मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र को पाकिस्तान और हिंदुओं के प्रांत को हिंदुस्तान में रखने लगा. बलूचिस्तान और सिंध के लिए तो कोई मुश्किल न हुई क्योंकि वहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक में थे. पर वैसे प्रांत जैसे बंगाल और पंजाब उसके लिए सिरदर्द बनें जहाँ दोनों धर्मों की घनी आबादी थी. जहाँ अनुपात लगभग बराबर थे. 

पाँच सप्ताह की अल्प अवधि में उसने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली. ज़ाहिर है ख़ामियों के साथ. उसकी रेखा ने खेतों-खलिहानों, नदी-नालों, शहर-गाँवों, ज़िल-तहसीलों और प्रांतों को एक दूसरे से अलग कर दिया. यहाँ तक कि कमरों से भी रेखा गुज़री. किसी घर का एक कमरा पाकिस्तान में पडा तो दूसरा हिंदुस्तान में.

पंजाब प्रांत के सबसे उत्तर वाले गुरदासपुर ज़िले की चार तहसीलों में से तीन बटाला, पठानकोट और गुरदासपुर को उसने हिंदुस्तान की झोली में डाला और चौथे तहसील शकरगढ को पाकिस्तान में. सिर्फ इसलिए कि शकरगढ बाकी तीनों तहसीलों से रावी नदी से अलग होती थी. शकरगढ पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब प्रांत के सियालकोट ज़िले का हिस्सा बना. गुरदासपुर ज़िले में मुस्लिमों की आबादी 49%, हिंदुओं की 40% और सिक्खों की दस प्रतिशत थी. आबादी का प्रतिशत बराबर करने के लिए लोगों को अपने अपने धर्म के बाहुल्य क्षेत्रों में जाने के लिए कहा गया. गुरदासपुर ज़िले के बँटवारे की भरपाई करने के लिए उसने फिरोज़पुर और ज़ीरा तहसील को पाकिस्तान के फिरोज़पुर ज़िले में डाल दिया.

फिर लाहौर की बारी आई. कभी अफवाहें फैलतीं कि लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रहेगा तो एक गहरी खामोशी फजाओं में घुल जाती, तो कभी उडती हुई ख़बर आती कि शायद लाहौर को रेडक्लीफ महोदय पाकिस्तान में रखेंगे तो अल्ला-हो-अकबर के नारे से गगन थर्रा उठता. लाहौर उस धान की बोरी के समान हो गया जिसे बिना काम का कोई किसान कभी एक कोठी में रखता तो कभी दूसरी कोठी में.

रेडक्लीफ की रिपोर्ट 17 अगस्त 1947 को आम की गई. लाहौर के बारे में रेडक्लीफ ने सबसे आखिर में निर्णय लिया था. रिपोर्ट आम होते ही जैसे आग लग गई.  लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा बना और बँटवारे की आग की लपटें लाहौर के साथ साथ दूर-दराज के गाँवों तक फैली. उस छोटे गाँव प्रीतमपुर में भी उस आग की लपटों की आँच हरपाल सिन्ह ने महसूस की. 

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लाहौर के पश्चिमी इलाके का एक छोटा सा गाँव. नाम प्रीतमपुर. आबादी करीब एक लाख. गाँव के चारों ओर मुस्लिमों की घनी आबादी. सिखों और हिंदुओं के छिटपुट घर. सत्तर तीस का अनुपात. जबकि पूरे लाहौर में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं की आबादी से तकरीबन दो-चार प्रतिशत ही अधिक थी. नाम के अनुरूप प्रीतमपुर में प्रीत की रीत हमेशा रही. कभी कोई वारदात नहीं, ख़ून-ख़राबा नहीं. अमन-चैन में हरपाल सिन्ह की ज़िंदगी गुज़र रही थी कि अचानक हवाओं में ज़हर घुल गया. पर उनके लिए रेडक्लीफ महोदय की खिंची जाने वाली रेखा का कोई मतलब न था. भले ही रेखा उनके गाँव से गुज़रे या घर से, भले ही प्रीतमपुर हिंदुस्तान में पडे या पाकिस्तान में, उन्हें रहना प्रीतमपुर में ही था. सदियों के भाईचारे ने उनमें वहीं जमे रहने का हौसला दिया था.

प्रीतमपुर हरपाल सिन्ह के लिए जन्नत था. उस गाँव में उनका परिवार रहता था. उनके पुरखे भी रहा करते थे. सौ-दो सौ साल का उस जमीन पर उनका लेखा-जोखा था. रसूख़ था. हरपाल सिन्ह की ड्योढी पूरे गाँव में विख्यात थी. उनके दरवाज़े से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा. अनाज या मेवे लोगों की झोली में उन्होंने जरूर डाले. उनके घर दूध-दही की कभी कमी न हुई. थका-हारा जो भी दरवाज़े पर आता, एक गिलास लस्सी जरूर मिलती. उनके तीन बेटों में सबसे बडे दरसन सिन्ह थे. फिर हरभजन सिन्ह और सबसे छोटा हरनाम सिन्ह. उन्होंने दुनिया देखी थी. भाइयों के दिलों में दरार ना आ जाए इसलिए अपनी ड्योढी के आजू-बाजू भी एक-एक ड्योढी बना डाली थी. मझला बेटा दाईं तरफ तो छोटा बाईं तरफ. दस्तूर के मुताबिक वे सबसे बडे दरसन सिन्ह के साथ बीच में रहते थे पर तीनों घर का आँगन एक ही था. जब जी चाहा, अपनी खटिया मझले या छोटे बेटे की ड्योढी के सामने आँगन में खींच लेते और हुक्का गुडगुडाते. सांझा चूल्हा था. आँगन एक ही दरवाज़े से बाहर की ओर खुलता था.

उनके घर में भाईयों और बीवियों के आपस के प्रेम के चर्चे थे. एक और चीज की चर्चा हुई जब उनके आँगन में एक ही साथ तीन-तीन लडकियों की किलकारी गूँजी. तीनों भाईयों को औलाद के नाम पर एक-एक लडकी हुई. दरसन सिन्ह की मनजीत, हरभजन की बेटी हरप्रीत और हरनाम सिन्ह की सुरजीत. तीनों भाइयों ने कुदरत से कभी भी लडकी देने के कारण शिकायत नहीं की और लडकियों ने भी घर के मर्दों को कभी महसूस न होने दिया कि वे किसी लडके से कम हैं.

3

वक्त को तो जैसे पाँव नहीं पंख लगे होते हैं. धीरे-धीरे नहीं बल्कि पल में उडान भर लेता है. वैसे ही लडकियों की उम्र होती है. जी भर गोद में खिलाया नहीं कि बडी हो जाती हैं. तीनों इतनी तेजी से बढी कि हरपाल सिन्ह की आँखों में आँसू आ जाते. अक्सर बुदबुदाते, वाहे गुरु, इनकी हिफाजत करना’.

सूरज उन्हें अपने साथ उठाता. चूल्हा सुलगा कर वे गायों सानी-पानी देतीं, आँगन में सभी इकट्ठे चाय पीते, फिर अम्मियों का हाथ बँटा हँसिया ले खेतों की ओर रुख़ करतीं. इस बात से बिल्कुल बेख़बर कि गाँव के शोहदे उनपर नज़र गडाए पेडों की झुरमुट में छिपे रहते हैं. घासों की गठरी सर पर रख जब वे घर आतीं तो अम्मियों से शिकायत करतीं कि आजकल घासों में मोथा बढ रहा है तभी तो पीठ में चुभन होती है. दरअसल यह चुभन मोथा की नहीं बल्कि शोहदों की कमीनी निगाहों की होती जो उनकी पीठ पर गडी होती. उन शोहदों और आवारा लडकों का सरदार था ग़ुलाम रसूल. वह एक ऐसी पार्टी से जुडा हुआ था जो गुंडो का अड्डा था. पार्टी का मुख्य कार्यालय अमृतसर में था जिसके सदस्य अमृतसर, लाहौर, से लेकर पठानकोट, फिरोज़पुर और गुरदासपुर तक फैले थे. सदस्यों को कौमी नफरत फैलाने, लूट-पाट करने और औरतों की इज़्ज़त पर हाथ डालने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं था. एक बार ग़ुलाम रसूल  अचानक ही पेडों के पीछे से मनजीत के सामने आ खडा हुआ और बोला,
होशियार रहना, एक दिन उठा कर ले जाऊँगा’.

4

अमृतसर से आया हुआ पार्सल जब ग़ुलाम रसूल ने खोला, उसके तन-बदन में आग लग गई. अपमान का कडवा घूँट पी गया. फिर उसने जैसे कोई निर्णय ले लिया. उसकी आँखों से अंगारे बरसने लगे. पार्सल में उसकी पार्टी के लोगों ने चूडियाँ और मेंहदी भेजी थी. साथ में एक ख़त भी था जिसमें लिखा था कि गर लाहौर को हिंदुओं और सिक्खों से खाली नहीं करवा सकते तो चूडियाँ पहन लेना और किसी कोठे पर बैठ जाना और औरतों की इज़्ज़त पर हाथ नहीं डाल सकते तो हाथों में मेंहदी लगा कर वापस आ जाओ, हम तुम्हें माफ कर देंगे.

ग़ुलाम रसूल ख़त पढने के बाद अपने आपे में न रहा. उसपर जैसे भूत सवार हो गया. हिंदुओं और सिखों के सर काटने की गिनती गिनने लगा. लाहौर और उसके आसपास के गाँवों में उसने  ख़ूब तलवारें चमकाई. उसके नाम से लोग ख़ौफ खाने लगे. अफवाहें गर्म हुई कि वह लाशों को लॉरियों में भरकर लाहौर ले जाता और अमृतसर जाने वाली ट्रेन में ठूँस देता. सिक्खों के घरों के सामने अपनी टोली ले कर आता, दरवाजे की सांकल बजाता. घर में दुबके लोग जब बाहर नहीं निकलते, तो घरों में आग लगा देता या दरवाजा तोड देता. चिल्ला कर कहता, अब तुम्हारा यहाँ क्या रक्खा है? बोरिया-बिस्तर समेटो और रात की रात अमृतसर कूच करो. लाहौर से सिर्फ बयालीस मील दूर.

लोग उसके पाँव पडते, हाथ जोडते. गिडगिडाते, “रसूल भाई, कैसे नहीं रखा है? यहाँ बाप-दादा के खेत-खलिहान हैं, ज़मीनें हैं, घर में पुरखों की निशानियाँ हैं.”

ग़ुलाम रसूल कहता, तो बेहतर है पुरखों की यादों के साथ इसी ज़मीन में ज़मींदोज़ हो जाओ और उसकी तलवार अपना काम कर बैठती.

5

पाकिस्तान बनने की खुशी में प्रीतमपुर में पहले तो कोई हलचल नहीं हुई. वैसे ही सूरज उगा. वैसे ही धूप खिली. दरसन सिन्ह अपने भाइयों और मवेशियों के साथ अपने खेतों की ओर रोज़ की ही तरह निकला था. पर कुछ देर बाद हवा ने रुख़ बदल लिया. पटाखे छूटने लगे और पटाखों की आवाज कुछ ही देर में तलवार और खड्ग की खडखडाहट में तब्दील हो गई.  ऐसा कैसे और क्यों हुआ इसका जवाब उस गाँव में तो क्या, पूरे लाहौर में किसी के पास न था. पर इतना जरूर तय था कि जब से ग़ुलाम रसूल ने प्रीतमपुर में कदम रखा, गाँव का वातावरण विषाक्त हो गया. वह इस्लाम के नाम पर ऐसी-वैसी बातें फैलाता जो अच्छे-सच्चे मुसलमानों ने पहले कभी नहीं सुनी. उसने हिंदुस्तान के बँटवारे के खिलाफ या पाकिस्तान बनने की ख़्वाहिश नहीं रखने वाले मुसलमानों के खिलाफ फतवा ज़ारी करने का एलान किया कि वैसे मुसलमानों को मरने पर इस्लामिक रीति से सुपुर्दे ख़ाक नहीं किया जाएगा. उन्हें जन्नत नसीब नहीं होगी. वे दोज़ख में गरम तेल में झुलसाए जायेंगे. अनपढों पर इसका खूब असर हुआ. उसकी पार्टी ने पर्चे भेजे जिसमें प्रचारित किया गया था कि सिक्खों और हिंदुओं के प्रति हमदर्दी रखने वालों को पाकिस्तान बन जाने के बाद कई सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा. इसका परिणाम यह हुआ कि पहले हरपाल सिन्ह की ड्योढी पर जुम्मन चौधरी, अफज़ल खाँ, और लियाकत अली बैठकें जमाते पर अब कन्नी कटाने लगे. एक दूसरे के घर से ईद-बक़रीद में सेवईयाँ और ख़जूर और गोश्त भी आते पर अब तो दुआ-सलाम और तस्लीम के भी लाले पडने लगे.
उसी दिन लाहौर के साथ-साथ प्रीतमपुर में तलवारें खनखनाने लगीं. हज़ारों लोग इधर-उधर भागने लगे. बेघरबार हो कर सरहद पार करने लगे. औरतों की इज़्ज़त लूटी जाने लगी या क़त्ल की गई. कइयों के साथ निकाह पढ कर ज़बरन मुस्लिम बनाने का दौर शुरु हुआ और बची-खुची के लिए बाज़ार के कोठे का दरवाज़ा खुल गया. किसी को पुरखों की ज़मीनें छोडनी पडी तो किसी को अपना घर. किसी ने पेड-पौधे, खलिहान छोडे तो किसी ने स्कूल-कॉलेज और नौकरियाँ. किसी ने प्रेम की निशानी छोडी तो किसी ने पुरानी सुनहली यादें. किसी की माशूका गुमनामी के अँधेरे में गुम हुई तो किसी ने इंतजार करना छोडा. हरपाल सिन्ह का विश्वास छूटा.

उन्होंने सपने में नहीं सोचा था कि सदियों का भाईचारा पलक झपकते ख़त्म हो चुका है. रोज़-रोज़ की ख़बरों ने उन्हें यूँ ही परेशाँ कर रक्खा था. पर अब आस्था की नींव पूरी तरह हिल चुकी लगी थी. ख़ौफ़ के साए में उनकी रातें कट रही थीं. सबसे बडी चिंता उनके लिए लडकियों को महफूज़ रखना ही थी. उनके लिए देश, धर्म, जान और इज़्ज़त इन सबमें इज़्ज़त ही सबसे प्यारी थी. जब भी हंगामे की ख़बर आती, खेतों से भागते दरसन सिन्ह, हरनाम और हरभजन आते और आँगन के दरवाजे में साँकल चढा कर तीनों लडकियों को घर के अंदर छुपने की सख़्त हिदायत देते. फिर हाथों में लट्ठ लिए दरवाजे के पास खडे हो जाते और आहट सुनते. हरपाल सिन्ह अपने बेटों से कहते,

पुत्तर, अक्सर सोचता हूँ देश किसे कहते हैं ? वह ज़मीं जहाँ हमारी जडें हैं और जहाँ हम सदियों से रहते आए हैं या वह ज़मीं जिसे रैडक्लीफ साहब ने तय किया है.
और धर्म ? वह धर्म धर्म नहीं हो सकता जो यह कहता हो कि तलवारें निकालो और अपने ही पडोसी का, माओं-बहनों का क़त्ल कर दो. सोचता हूँ रैडक्लीफ महोदय से मिलूँ और पूछूँ, ये कैसी रेखा खींची है तुमने....मेरी बच्चियों की किस्मत की रेखा ख़ींचने का अधिकार तुम्हें किसने दिया ? उन्हें महफूज़ रहने का अधिकार कुदरती है फिर क्यों कुदरत के काम में दख़लअंदाजी ?’

पर विभाजन की रेखा के साथ कुदरत ने लोगों की किस्मत की भी रेखा जोड रखी थी. ग़ुलाम रसूल को पार्सल क्या मिला उसने लोगों की अक्ल पर पर्दा डाल दिया. आपसी प्रीत के धागे इस कदर उलझे कि गाँठे सुलझाने की सामर्थ्य किसी में न रही. दरअसल किसी ने कोशिश भी न की. बस सबके सर पर एक खब्त सवार हो गया. एक बहशी जुनून. नंगी तलवारें फज़ाओं में चमकने लगीं. जिसे देखो, भागता नजर आने लगा. कोई किसी के पेट में खंजर घुसेडता तो कोई सर धड से अलग कर देता मानो बदन पर सबसे बडा बोझ सर का ही रखा हो.

6.

यक-ब-यक ग़ुलाम रसूल को हरपाल सिन्ह की याद आई. उनके घर की लडकियों की याद आते ही एक अजीब सी चमक उसकी आँखों में तैरने लगी. अपने जत्थे के साथ चल पडा हरपाल सिन्ह की ड्योढी की ओर. सभी के हाथ में तलवारें चमक रही थीं. उस जत्थे में कई ऐसे थे जिनके साथ हरपाल सिन्ह का आपसी राब्ता था. पर जुनून में पुराने मरासिम काम नहीं आते.

उस वक्त हरपाल सिन्ह के तीनों बेटे खेतों में काम कर रहे थे. तीनों लडकियाँ घर में अम्मियों के हाथ बँटा रही थी. हरपाल सिन्ह बाहरी माहौल से बेचैन होकर हरनाम के कमरे के सामने वाले आँगन में खटिया बिछा हुक्का गुडगुडा रहे थे.

हुजूम को अपने घर की तरफ जाते देख हरनाम ने हरभजन और दरसन को आवाज़ दी. तीनों घबरा कर अपने घर की ओर दौडे. हरनाम जत्थे के बिल्कुल करीब आ गया कि अचानक उस भीड में से किसी की तलवार ने हरनाम की गर्दन उडा दी. हरभजन और दरसन ठगे से खडे रह गए. अपने भाई को गिरता देख उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं. फिर ख़ौफ़ज़दा हो उल्टे पाँव भागे. कानों में आवाजें चुभने लगीं, पकडो कमीनों को, देखो, भागने ना पायें. फिर आवाज़ आई, छोडो सालों को, लडकियों को उठाओ. बरसों के सम्बंध एक पल में ही धूल में मिल गए.

लडकियों के बारे में सुनते ही हरभजन और दरसन घर की तरफ भागे. जत्थे के पहुँचने के पहले ही उन्होंने हरपाल सिन्ह को हरनाम के कत्ल की जानकारी दी. हरपाल सिन्ह ने गहरी आहें भरी. सबेरे से उन्हें कुछ अनहोनी का अंदेसा था तभी तो उन्होंने हरनाम के कमरे के सामने अपनी खटिया बिछाई थी.  दोनों भाईयों ने खड्ग निकाल लिया. लडकियाँ और अम्मियाँ ख़ौफ़ से रोने-चिल्लाने लगीं. एक तरफ हरनाम की पत्नी बेवा हो जाने के कारण बेहोश होकर गिर पडी. उसके मुँह पर छींटे मारे गए तो उसने आँखें खोल दी. फिर वह दहाड मार कर विलाप करने लगी.

हरपाल सिन्ह ने चिल्ला कर कहा, यह रोने-चिल्लाने का बखत नहीं है, सोचने का वक्त है और उन्होंने एक ऐसा कारनामा सोच लिया जिसे ना तो कभी पहले किसी ने सुना था और ना ही देखा. बिन बताए ही हरभजन और दरसन ने उनके इरादे जान लिए. अम्मियों ने भी भाँप लिया कि क्या होने वाला है. आपस में बिन बात किए आपसी सहमति बन गई. हैरत की बात कि लडकियाँ भी समझ गई और उनके चेहरे पर शिकन तक न आई.

अम्मियों ने अपने लख़्ते-जिगर को गले से लगाया. उनके गाल चूमे. जबीं पर बोसे लिए. फिर दुपट्टे से सर ढक कर सजदे करने को कहा. सबसे पहले सबसे छोटी सुरजीत सर पर चुनरी डाल सर झुका कर बैठ गई. खट की आवाज़ आई और एक ही झटके में हरपाल सिन्ह ने अपनी प्यारी पोती का सर धड से अलग कर दिया. हरनाम के कत्ल की ख़बर और अपनी बेटी को मरा देखने के बाद हरनाम की पत्नी को जीने की कोई वजह नही दिखाई दी. वैसे भी दंगाई उसे जीने का मौका कहाँ देने वाले थे. उसने अपने आप पेट में खंजर घुसा लिया और एक तरफ ढेर हो गई.

मझली बेटी हरप्रीत ने सहज भाव से माथे पर चुन्नी डाल सर झुका लिया. खट की आवाज़ आई और वह परलोक सिधार गई. उसकी अम्मी ने भी मरने में देर न लगाई.

मनप्रीत दुपट्टे से सर ढक गर्दन पर तलवार गिरने की राह देखने लगी. कुछ क्षणों की देरी होने से उसने चुन्नी सरका कर मुड कर देखा. दादा के हाथ काँप रहे थे. दो पोतियों को मौत की घाट उतारने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे गई थी. मनप्रीत ने फिर अपने पिता दरसन सिन्ह और ताऊ हरभजन सिन्ह की ओर देखा. एक कोने में दरसन और हरभजन थर-थर काँप रहे थे. उसने गिडगिडा कर कहा,

दादाजी, सुरजीत और हरप्रीत के बगैर अब मुझे नहीं जीना. ग़ुलाम रसूल के छूने के पहले बेहतर है प्राण त्याग देना. आपको हिम्मत नहीं हो रही तो पिताजी और ताऊ, उठाओ तलवार और काम तमाम कर दो मेरा. जल्दी करो

तभी दरवाज़े पर शोर-गुल मचा. हरपाल, हरभजन और दरसन आँगन की तरफ भागे. एक ही धक्के में लकडी का दरवाज़ा टूट कर औंधे मुँह गिरा. बलवाईयों ने हरपाल, हरभजन और दरसन को हाथों में नंगी तलवार के साथ देखा. फिर आँगन में औरतों की लाशों पर उनकी नज़र गई. एक कोने में बैठी मनप्रीत पर जैसे ही उनकी नज़र पडी वे हरभजन, हरपाल और दरसन की तरफ लपके. ग़ुलाम रसूल ने हरपाल सिन्ह से कहा, लडकी को हमारे हवाले कर दो तो तुम सबकी जान बक्श देंगे

इससे पहले कि ग़ुलाम रसूल मनप्रीत की तरफ बढता, खटाक की आवाज़ के साथ मनप्रीत की गर्दन धड से अलग हो गई. दरसन सिन्ह ने करारा वार किया था.

लडकियों और औरतों की लाशें देख कर ग़ुलाम रसूल सर धुनने लगा. मनप्रीत का निष्प्राण शरीर सुकूँ की गहरी नींद में लुढका पडा था. लाशें भी ग़ुलाम रसूल और उसके साथियों के मंसूबे पर पानी फेर कर मुस्कुरा रही थीं, मानों कह रही हों,

“सुना है, लाहौर से अमृतसर जाने वाली ट्रेनों में तुमलोगों ने लाशें भेजी थीं और डिब्बों में ख़ून से लिखा था, काटना हमसे सीखो’. नफरत दिल में रखकर हज़ारों लाशें गिराई जा सकती हैं और कोई किसी को भी काट सकता है. पर ज़रा अपनी औलाद और कलेजे के टुकडे को काट कर दिखाओ बुज़दिलों”.

ग़ुलाम रसूल चुपचाप हरपाल की ड्योढी के बाहर निकल आया. हरपाल सिन्ह की ड्योढी से पहली बार कोई खाली हाथ वापस लौटा.  फिर इसके बाद उसे कभी किसी ने नहीं देखा.

7

सन दो हज़ार ईसवी. नई सदी में प्रवेश करने के लिए दुनिया तैयार बैठी है. पर धर्म के नाम पर होने वाले दंगों में कमी नहीं हुई. हर दंगों में फिर हज़ारों मौत के घाट उतारे गए. यह नफरत की आँधी थमने का नाम ही नहीं लेती. प्रीतमपुर गाँव में हरपाल सिन्ह के घर की घटना को इतिहास बने बावन साल हो चुके हैं.

वक्त के घूमते पहियों के बीच पाकिस्तान के पंजाब के एक छोटे से गाँव शकरगढ में स्थित एक मज़ार की ख्याति दूर-दूर तक फैली. किंवदंतियाँ फैली कि यहाँ चादर चढाने से घर नहीं टूटते. आपसी प्यार बढता है. प्यार चाहे पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, भाई-भाई का हो या पडोसी का. मुकदमों के फैसले शीघ्र हो जाते हैं. उस मज़ार के बाहर एक बूढा फकीर गुमसुम बैठा रहता है, जिसके होंठ मंत्र के निरंतर जाप से हिलते रहते हैं. लोगों का कहना है कि वह फ़कीर मुस्लिम नहीं, कोई सिक्ख है. पचास साल पहले मज़ार के पास बेहोशी में गिरा पाया गया था. होश आने के बाद से वह फिर वहाँ से कहीं नहीं गया.

सिर्फ एक व्यक्ति जानता है कि वह और कोई नहीं, प्रीतमपुर का दरसन सिन्ह है. वह व्यक्ति लाहौर से हिंदुस्तान आने-जाने वाली ट्रेनों में सफाई करने वाला पचासी साल का बूढा है. उसके बारे में भी लोगों को कोई विशेष जानकारी नहीं. किसी से उसका कोई सम्बंध नहीं. खामोश ज़िंदगी है उसकी. उसे रातों में डरावने ख़्वाब आते हैं. दोज़ख में खौलते तेल की कडाही दिखाई देती है. फिर वह घबरा कर उठ बैठता है. साल में एक बार वह शकरगढ की मज़ार पर चादर चढाने आता है और फक़ीर के दोनों हथेलियों को अपने हाथों में भरकर फूट-फूट कर रोता है. दरसन सिंह उसे कुछ नहीं कहता. पर हथेली के स्पर्श से वह समझ जाता है कि दरसन सिन्ह के दिल में उसके प्रति कोई भावना नहीं. शायद उसने उसे माफ कर दिया हो.

उसे स्टेशन और ट्रेनों के हर डिब्बों में ख़ून ही ख़ून नज़र आता है. बिना कुछ बोले पिछले पचास सालों से वह डिब्बों को बडे ही मनोयोग से धोता चला आ रहा है कि ख़ून के वे दाग़ जल्दी मिटे कि उसके बदन की सलाखों में क़ैद रूह शीघ्र मुक्त हो सके.

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